जिज्ञासा की जिज्ञासा
मैं जीवन में नित नए अनुभवों से रूबरू होती हूँ,जो मेरे अंतस से सीधे साक्षात्कार करते हैं,उसी साक्षात्कार को कविता के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास है मेरा ब्लॉग, जिज्ञासा की जिज्ञासा
गौरैया दिवस विशेष.. कुंडलियाँ
प्रकृति के सफ़ाईकर्मी संकट में.. दो गीत!
“प्रकृति के सफ़ाई कर्मी संकट में”
पर्यावरण संरक्षण को समर्पित “प्रकृति दर्शन पत्रिका” का हर अंक अपने आप में विशेष होता है, उसी क्रम में दिसंबर माह का अंक तो विशेष में भी विशेष है ‘गिद्ध बचाओ प्रकृति बचाओ’ विषय पर केंद्रित यह अंक पठनीय और संजोने वाला है। विषयानुसार इस अंक में मेरे भी दो गीत प्रकाशित हैं।
माटी तेरा मोह न छूटा.. गीत
माटी तेरा मोह न छूटा
तेरे कारण ही जग रूठा
जब सोलह श्रृंगार किया
तो बैरी हुआ सलोना प्रीतम
भूल गई अपनी परछाईं
बैठ बजाती रही मृदंगम
जितने फेरे लिए अग्नि के
उतने युग प्रीतम ने लूटा
ऐसा बीज मिला हिस्से में
सींचा पर न हुआ अंकुरित
लाखों यत्न प्रयत्न विफल सब
दूषित हुआ भाव संप्रेषित
तटबंधों की कृत्रिम धरा थी
ताना बाना पाना टूटा
इस माटी ने उस माटी को
बारंबार पुकारा रह-रह
तू सनाथ है मैं अनाथ री
बाँह पकड़ ले मेरी, कर गह
हँसती रही निपात हँसी वह
जब पकड़ा तब भाँडा फूटा
जब-जब बहा प्रपात क्षुधा का
तब-तब माटी हुई संक्रमित
बैठ किरण पर उड़ी पवन संग
मिली दिशा न जाऊँ मैं कित
सत्य कहूँ माटी का दर्पन
खिला गया है बूटा-बूटा
जिज्ञासा सिंह
बाल रचना- गिरी बरफ़ है (चौपाई छंद)
देखो चमके दूर शिखर।
गिरी बरफ़ है भर-भर-भर॥
बढ़ी पहाड़ों पर है सर्दी।
सेना पहने मोटी वर्दी॥
सरहद-सरहद घूम रही है।
माँ धरती को चूम रही है॥
भेड़ ओढ़कर कंबल बैठी।
बकरी घूमे ऐंठी-ऐंठी॥
याक मलंग जा रहा ऊपर।
बरफ़ चूमती है उसके खुर॥
मैदानों में मेरा घर है।
चलती सुर्रा हवा इधर है॥
टोपी मोज़ा पहने स्वेटर।
काँप रहा पूरा घर थर-थर॥
कट-कट-कट-कट दाँत कर रहे।
जब भी हम घर से निकल रहे॥
हवा शूल बन जड़ा रही है।
कँपना पल-पल बढ़ा रही है॥
करना क्या है सोच रहे हम?
आता कोहरा देख रहे हम॥
ऐसे में बस दिखे रज़ाई।
मम्मी ने आवाज़ लगाई॥
अंदर आओ आग जली है।
खाते हम सब मूँगफली हैं॥
जिज्ञासा सिंह
ज्योति की स्थापना में
ज्योति की स्थापना में
प्रज्ज्वलित हों उत्सवित हों
रश्मियाँ संसार की।
भूलना न मन कभी,
अभिकल्पना आधार की॥
निष्कलुष होकर हृदय
निज का लगाना प्रार्थना में।
ज्योति की अभ्यर्थना में॥
बच गए गर डूबने से,
मध्य सागर में खड़े।
तारिकाएँ तोड़ लीं जो,
आसमाँ से, बिन उड़े॥
समर्पण-सदभाव-श्रद्धा,
डूब जाना भावना में।
ज्योति की अभ्यर्चना में॥
ज्योति में है रम्यता,
चैतन्यता अभिसार दे।
हो प्रवाहित हृदय में,
धारा दे पारावार दे॥
आत्म जागृत, प्राण पोषित,
लीनता दे साधना में।
ज्योति की आराधना में॥
जिज्ञासा सिंह
टहनियाँ फूल से भरने लगी हैं.. गीत
टहनियाँ फूल से
भरने लगी हैं
बंजरों की झाड़ काटी
कंटकों की बाड़ छाँटी
मृत पड़ी माटी जगाईं
और कुछ ऐसे जगाईं
मरुधरा विकसित-हरित
खिलने लगी है॥
खुदी का खोदा कुआँ था
पल रहा जिसमें धुआँ था
नीर था संक्रमित दूषित
कमल-शतदल किया रोपित
हर तरफ़ कलियाँ खिलीं
हँसने लगी हैं॥
था जहाँ स्वामित्व रण का
स्वामिनों के अपहरण का
जाल का घेरा घनत्व
छाँट बोए निरत सत्व
राह की पगडंडियाँ
दिखने लगीं हैं॥
जिज्ञासा सिंह
नारायण-नारायण बोलो बूढ़े मन
नारायण-नारायण बोलो बूढ़े मन
अपना लेखा जोखा तोलो बूढ़े मन
क्या खोया क्या पाया अब तक
कहाँ तलक है पहुँची दस्तक
खाकें छानीं फाँकीं धूलें
छूटी कहाँ यार की बकझक
कितने पापड़ बेले कितने तोड़े घन
हिलो-डुलो मत उमर हो गई तेरी
छोड़ो हाटें छोड़ो करनी फेरी
भूलभुलैया की गलियों में
उमर बिताई कर-कर हेराफेरी
समय साथ चल-चल करता अभिनंदन
थोड़ा हो चैतन्य जागरूक बनो
गुनो धुनो कुछ नया नवेला सुनों
मध्यमार्ग पथ के उपवन की
छाँहें झरती ठंढी-ठंढी चुनों
छोड़ो माया और मोंहों के कानन
जिज्ञासा सिंह