क्षणिकाएँ..अनुभूति

खामोशियाँ 
लिहाज का वसन
अंगवस्त्र बदन
कहने को गुस्ताखियाँ

सहनशक्ति
घातक निरंकुश
मन पर अंकुश
अपरमित असीम भक्ति

चोट
मन पर
मन के जखम पर
नहीं था कोई खोट

दर्द
कैसे सहूँ
किससे कहूँ 
सब्र, बड़ा बेदर्द

इंतहा
इंतजार की
हार की
सब कुछ सहा

रुलाई
की कथा
सुनाई व्यथा
हुई जग हँसाई

रोम रोम
गिरवीं 
न आसमां न जमीं
तुम पर होम

व्याप्त
क्लेश, भोजन
तन मन धन
विषाक्त

**जिज्ञासा सिंह**
चित्र: साभार गूगल

18 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार (24-09-2021) को "तुम रजनी के चाँद बनोगे ? या दिन के मार्त्तण्ड प्रखर ?" (चर्चा अंक- 4197) पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद सहित।

    "मीना भारद्वाज"

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    उत्तर
    1. आदरणीय मीना जी,रचना को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए आपका बहुत बहुत आभार एवम अभिनंदन।आपको मेरी असीम शुभकामनाएं।

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  2. बहुत बहुत आभार कविता जी,प्रशंसा को सादर नमन ।

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  3. रुलाई
    की कथा
    सुनाई व्यथा
    हुई जग हँसाई
    वाह!!!
    बहुत ही सटीक एवं सारगर्भित क्षणिकाएं
    लाजवाब।

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  4. बहुत बहुत आभार सुधाजी,आपकी प्रशंसनीय प्रतिक्रिया को हार्दिक नमन।

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  5. दर्द
    कैसे सहूँ
    किससे कहूँ
    सब्र, बड़ा बेदर्द

    बहुत सुंदर क्षणिकाएं,सादर

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    उत्तर
    1. बहुत बहुत आभार कामिनी जी,आपकी प्रशंसनीय प्रतिक्रिया को हार्दिक नमन ।

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  6. बहुत ही मार्मिक हृदयस्पर्शी रचना

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  7. बहुत ही सुंदर हृदयस्पर्शी क्षणिकाएँ दी।
    सादर

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  8. बहुत ही भाव पूर्ण है आपके लघु सृजन जिज्ञासा जी।
    छोटे में गहराई समेटे बिल्कुल नावक के तीर!
    देखन में छोटे लगे घाव करें गंभीर।
    अप्रतिम।

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  9. आपकी प्रशंसा सृजन को सार्थक कर गई,बहुत आभार कुसुम जी ।

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  10. कम शब्दों में संपूर्ण अभिव्यक्ति,
    सभी क्षणिकाएं अत्यंत सुंदर है प्रिय जिज्ञासा जी।

    सस्नेह।

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  11. बहुत बहुत आभार आपका श्वेता जी ।

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