सत्र पर बस ध्यान दो


क्या हुआ क्या रह गया ?
कौन क्या-क्या कह गया ?
जितने मुँह उतनी कथन,
मत किसी पर कान दो ।
सत्र पर बस ध्यान दो ॥

जिंदगी का लघु या विस्तृत सत्र ये, 
पालता है शत्रु लाखों मित्र ये ।
क्षणिक क्षण में रूप बदले रंग भी,
पग पे पग है रख रहा सर्वत्र ये ॥
खुद ही प्रेरक,खुद ही बनता प्रेरणा,
बस इसे उत्थान दो ॥

बोया अपना काटना है, है नियम,
बूझकर अब हर उठाना है कदम ।
भार लेकर शीश पर चलना पड़ेगा,
वक्त करता है नहीं कोई रहम ॥
सोच को करना परिष्कृत है अभी,
रहने उसे गतिमान दो ॥

एक दिन और एक दिन बीते सदी,
रोक न पाया कोई बहती नदी ।
बह रही थी,बह रही अपनी ही लय में,
कीच कचरे से भरी छाती लदी ॥
धार पकड़ो उस नदी का बह चलो, 
मार्ग की पहचान दो ॥

**जिज्ञासा सिंह**

13 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (25-05-2022) को चर्चा मंच      "पहली बारिश हुई धरा पर, मौसम कितना हुआ सुहाना"  (चर्चा अंक-4441)     पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'    
    --

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    1. बहुत बहुत आभार आदरणीय शास्त्री जी।
      मेरी रचना को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए आपका हार्दिक अभिनंदन।
      मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।

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  2. एक दिन और एक दिन बीते सदी,
    रोक न पाया कोई बहती नदी ।
    बहुत सुंदर..
    सादर..

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    उत्तर
    1. आपकी सार्थक प्रतिक्रिया ने रचना को सार्थक कर दिया। बहुत आभार आपका दीदी

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  3. बस इसे उत्थान दो ...सुन्दर सृजन

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  4. एक दिन और एक दिन बीते सदी,
    रोक न पाया कोई बहती नदी ।
    बह रही थी,बह रही अपनी ही लय में,
    कीच कचरे से भरी छाती लदी ॥
    धार पकड़ो उस नदी का बह चलो,
    मार्ग की पहचान दो ॥
    क्या बात है प्रिय जिज्ञासा जी
    बहुत भारी पड़ेंगी किसी दिन अपनी गलतियाँ| सस्नेह

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  5. आपका बहुत बहुत आभार ।

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  6. "बोया अपना काटना है, है नियम,
    बूझकर अब हर उठाना है कदम ।"
    वाह! बहुत बढ़िया संदेशपरक!!! पूर्ण लेखनी धर्म का निर्वाह!!! बधाई!!

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  7. प्रेरित करतीं सुंदर पंक्तियाँ

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  8. सुंदर संदेश देती रचना, जिज्ञासा दी।

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