सोचना कुछ तो पड़ेगा

सभ्यताओं के महल 
जब खंडहर होने लगेंगे,
फूल बनके शूल जब भर
पाँव में चुभने लगेंगे, 
सोचना कुछ तो पड़ेगा 

सोचना हमको है उस परिवेश को,
हो जहाँ पे सभ्यताओं का उदय ।
दीमकों का भी जहाँ साम्राज्य हो,
और मिलता हो घुनों को भी प्रश्रय ॥
खोखली जो कर रहे हैं वे जड़ें,
उन जड़ो को सींचना हमको पड़ेगा ॥

काली काली बदलियाँ हों उठ रहीं,
इंद्र्धनुषों का चुका हो जब पलायन ।
बूँद भी बरसें धरा पर कंटकों से,
मलिनता बिखरी पड़ी भू से गगन ॥
जटिलता के द्वार का हर रास्ता
प्रेम और सौहार्द्र से अब मोड़ना हमको पड़ेगा ॥

भूमि में जल की जगह पे अग्नि हो,
हैं हवा में रेत के बारूद उड़ते ।
प्रस्तरों के खंड राहों में पड़े,
मनुजता के द्वार पर हों मनुज भिड़ते ॥
मच रहे भूचाल का संदर्भ ले 
हर दिशा को नवलता से जोड़ना हमको पड़ेगा ॥

सिंहनादी हो रहा हर ओर जो,
सौ निनादों से जुड़ा जो नाद है ।
अव्ययों के हो रहे विस्तार का,
नव कुटुम जो दिख रहा आबाद है ॥
आँधियां संग लेके आऐंगी बवंडर
उस बवंडर की ध्वजा को तोड़ना हमको पड़ेगा ॥

**जिज्ञासा सिंह**

12 टिप्‍पणियां:

  1. जिज्ञासा, हम सोचे कहाँ से और कुछ भी करें कैसे? तुम्हारी कविता ने तो क़यामत की रात का खौफ़ दिखा कर हमारी अक्ल पर और हमारे हाथ-पैर पर ताला सा लगा दिया है.

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  2. जिज्ञासा दी, सोचना तो हमे जरूर पड़ेगा। आँखे खुली रख कर कार्य करने होंगे तभी इस दुनिया मे टिक पाएंगे। बहुत सुंदर।

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  3. वाकई आज के हालातों को देखते हुए सभी को बहुत सजग होकर रहने की जरूरत है,

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  4. बहुत ही बेहतरीन रचना!
    बिल्कुल सही कहा आपने मैम सोचना तो पड़ेगा..!

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  5. ब्लॉग पर सार्थक टिप्पणी के लिए शुक्रिया प्रिय मनीषा ।

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  6. सकारात्मक भावों को पोषित करती अत्यंत रचना के लिए आपको बहुत बहुत बधाई जिज्ञासा जी !

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