पकड़ ग्यो आजु माखनचोर


बाला ओ गोपाला, प्यारे नंद जी को लाला तुम
काहे मोहें लुक छिप, करो हैरान है ।
बारी बारी लख बारी, करती मआफ तोहें
सोचे यही मन मेरो, छोरो नादान है ।।

खाय लियो मक्खन, मटकियाँ भी फोर दई
कहें गोकुलबासी, गिरधारी सैतान है ।
काऊ समझाऊँ, किस किस सो लुकाऊँ 
यह जसुदा का जाया, छुपो मेरो ही मकान है ।।

कोने कोने छुपो फिरे, करै मोसे हठ खेली
बड़ो प्यारो लागे, जब करे परेसान है ।
सबरे गोपाल बाल, भागे हैं भवन निज
हाथ मेरे चढ़ो आज, सबको प्रधान है ।।

**जिज्ञासा सिंह**

52 टिप्‍पणियां:

  1. वाह मन मोहक सृजन कान्हा जी की बाल लीलाएं सदा लुभावनी मनभावन होती है ,उस पर आपकी यह शानदार वात्सल्य रस भरी सरस रचना।
    बहुत बहुत सुंदर जिज्ञासा जी।

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    1. आपका बहुत बहुत आभार, आपकी सुंदर,सरस प्रतिक्रिया मन मोह गयी ।

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  2. प्रधान पकड़े गए । बहुत प्यारी रचना । कृष्ण के कितने रूप ।
    एक माखनचोर भी ।

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  4. क्या कहने हैं जिज्ञासा जी आपकी इस रचना के! ऐसा प्रतीत होता है मानो हम कविवर सूरदास जी के ही काव्यमय उद्गारों का आनंद ले रहे

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    1. इतनी महान उपमा के लायक़ मेरा सृजन कहाँ है,जितेन्द्र जी,परंतु मैं आपके सुंदर प्रतिक्रिया से अभिभूत हूँ,सादर नमन।

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    2. अपनी कल की चर्चा में कुछ ऐसा से ही लिखा है ।
      जितेंद्र जी आपकी बात से सहमत हूँ ।

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  5. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (5-07-2021 ) को 'कुछ है भी कुछ के लिये कुछ के लिये कुछ कुछ नहीं है'(चर्चा अंक- 4116) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है।

    चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।

    यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

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    1. आदरणीय रवीन्द्र जी,ब्लॉग पर आपका हमेशा हार्दिक स्वागत है,आपका चर्चा मंच मुझ जैसे रचनाकारों को प्रेरित करता है,जो नव सृजन करने तथा मनोबल बढ़ाने का आधार बनते हैं।
      मेरी रचना के चयन के लिए आपका कोटि आभार,आपको मेरा सादर नमन।शुभकामनाओं सहित जिज्ञासा सिंह..

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  6. आपकी लिखी रचना सोमवार 5 जुलाई 2021 को साझा की गई है ,
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    संगीता स्वरूप

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    1. आदरणीय दीदी,
      मेरी रचना का चयन करने के लिए आपका बहुत बहुत आभार एवं अभिनंदन,सादर शुभकामनाओं सहित जिज्ञासा सिंह...

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  7. वाह!बहुत ही सुंदर सृजन मन मोहता।
    सादर

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  8. अनिता जी,आपकी सुंदर प्रशंसा को सादर नमन।

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  9. जु जु जु जू..
    यशोदा का नंदलाला..
    काऊ समझाऊँ, किस किस सो लुकाऊँ
    यह जसुदा का जाया, छुपो मेरो ही मकान है ।।
    बढ़िया उत्सव परक प्रस्तुति
    सादर..

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    1. आदरणीय दीदी,आपकी टिप्पणी सृजन को सार्थक बना देती है,आपको मेरा सादर नमन एवं वंदन।

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    1. दीदी,आपके लिंक पर जाकर गनेबका आनंद ले आई,आपका बहुत बहुत आभार एवम नमन।

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  11. प्रेम का सबसे शुद्ध अलौकिक रुप जो कृष्ण ने सिखाया वैसा दर्शन विरल है।
    अति मनमोहक सृजन प्रिय जिज्ञासा जी।

    सस्नेह।

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    1. बहुत बहुत आभार की श्वेता जी, आपको मेरा सादर नमन।

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  12. वाह!खूबसूरत सृजन जिज्ञासा जी ।

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  13. कृष्ण की बाललीला का मनमोहक वर्णन । उत्कृष्ट सृजन जिज्ञासा जी!
    इतने सुन्दर सृजन के लिए बहुत बहुत बधाई।

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    1. आदरणीय मीना जी,आपका बहुत बहुत आभार एवम आपको मेरा सादर नमन।

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  14. बहुत सुंदर ! कभी-कभी बड़ी व्यथा सी होती है अचरज भी होता है कि कैसे खुद अपने अवतार की रुपरेखा बनाई थी ! कैसी नियति तय की थी अपने लिए ! जन्म से लेकर मृत्यु तक शोक, विरह, लांछन, संघर्ष, अपयश, निंदा, दुःख से तपाया था अपने आप को ! दुनिया में ऐसा कुंदन बन उभरा कोई दूसरा चरित्र हो ही नहीं सकता !

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    1. जी,गगन जी सही कहा आपने,आपकी सुंदर सार्थक प्रतिक्रिया ने कविता को सार्थक बना दिया, आपको मेरा सादर नमन एवम वंदन।

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  15. सुन्दर बाल लीला वर्णन श्री कृष्ण का!बहुत सुन्दर!!

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    1. आपका बहुत बहुत आभार अनुपमा जी, आपको मेरा सादर नमन।

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  16. कृष्ण की बाल लीला को बहुत ही सुंदर शब्दों में उकेरा है आपने, जिज्ञासा दी।

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  17. आपका बहुत बहुत आभार ज्योति जी,आपको मेरा सादर नमन।

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  18. स़ुदर वात्सल्य रस से परिपूर्ण रचना।
    नमन

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  19. सबरे गोपाल बाल, भागे हैं भवन निज
    हाथ मेरे चढ़ो आज, सबको प्रधान है ।।---वाह मधुरम लेखन...। शैली और सृजन दोनों ही बेहद गहरे हैं। बधाई आपको जिज्ञासा जी।

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  20. बहुत सुंदर, मीठी ब्रजभाषा ने बाललीला को और मधुर बना दिया है।

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  21. बहुत बहुत आभार मीना जी, आपकी प्रशंसा को सादर नमन।

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  22. खाय लियो मक्खन, मटकियाँ भी फोर दई
    कहें गोकुलबासी, गिरधारी सैतान है ।
    काऊ समझाऊँ, किस किस सो लुकाऊँ
    यह जसुदा का जाया, छुपो मेरो ही मकान है ।।
    बाल लीला की मनोरम झांकी संजोई है आपने शब्दों में। हार्दिक शुभकामनाएं 👌👌🌷💐🌷🙏

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    1. आपका बहुत बहुत आभार रेणु जी,आपकी प्रशंसा को हार्दिक नमन करती हूं।

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  23. सबरे गोपाल बाल, भागे हैं भवन निज
    हाथ मेरे चढ़ो आज, सबको प्रधान है
    वाह!!!!
    सबका प्रधान पकड़ ही लिया आपने ...बहुत ही मनभावन उत्कृष्ट सृजन जिज्ञासा जी!बहुत बहुत बधाई इस नायाब कृति हेतु...
    लाजवाब।

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  24. बहुत बहुत आभार सुधाजी, आपकी प्रशंसनीय प्रतिक्रिया का हार्दिक स्वागत है,आपको मेरा सादर नमन।

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  25. छोरो नादान है…सच में सूरदास याद दिला दिए…बहुत सुन्दर रचना ❤️

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    1. उषा जी,आपकी प्रशंसनीय प्रतिक्रिया को सादर नमन।

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  26. आदरणीय सर,आपकी प्रशंसा कविता को सार्थक बना देती है, आपको मेरा सादर अभिवादन।

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  27. आदरणीया मैम, लोकभाषा में बाल -गोपाल की लीला पढ़ कर आनंदित हूँ । मन में उनका नटखट माखन-चोर रूप उतर गया है । गोपियाँ तो माखन कान्हा जी के लिए ही मथतीं थीं और माँ यशोदा से शिकायत करना या कान्हा जी को रंगे हाथों पकड़ना तो उनके दर्शन करने का और उनके साथ समय बिताने का बहाना था । हृदय से आभार इस सुंदर रचना के लिए व आपको प्रणाम ।

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  28. बहुत आभार और स्नेह प्रिय अनंत,हमेशा ख़ुश रहो।

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  29. सुंदर शब्दों में उकेरा है बाल लीला को

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  30. आपकी अनमोल टिप्पणियों का हार्दिक स्वागत करती हूं।सादर नमन।

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