क्या सावन है


क्या सावन है 

सुआ हरा हरा
आसमान भी हरा हरा
तलैया हरी हरी
निमिया हरी हरी 
दृश्य लुभावन है 
क्या सावन है ?

गाँव झूमे 
बगिया झूमे  
हरसिंगार झूमे 
बाँसकोठी गिर गिर झूमे 
बहे पुरवैया बयार सुहावन है 
क्या सावन है 

झींगुर गाए  
पपिहा गाए 
भौंरा गाए 
गोरी गाए 
कजरी,मल्हार मनभावन है 
क्या सावन है

नौ मन बरखा
झर झर बरखा
झिमिर झिमिर बरखा
बदरी बरखा
सतरंगी छावन है
क्या सावन है

घंटा बजे
घड़ियाल बजे
डमरू बजे
करताल बजे
रग रग पावन है
क्या सावन है...

**जिज्ञासा सिंह**

परिस्थिति का मारा


ये लाल परिस्थिति का मारा
किसकी आँखों का तारा है ।
न साथ में मातु पिता इसके
न दिखता कोई सहारा है ।।

कुछ एक घड़ी पहले मैंने
देखा था दौड़ लगाते इसे
मेरी गाड़ी उसकी गाड़ी
के आगे पीछे जाते उसे

मेरे भी केशों की सज्जा को
वेणी लेकर आया था
बोला था ले लो एक लड़ी
दस रुपया दाम बताया था

मैं कहूँ तू ले ले दस रुपया
पर वेणी नहीं खरीदूँगी
तू मुझसे ज़िद मत कर प्यारे
मैं बीस रुपैया दे दूँगी

वह बोला मुझसे तान भृकुटि
क्या तुम्हें भिखारी लगता मैं
अपने सम्मान की खातिर ही
फूलों की फेरी करता मैं

बिन मातु पिता का बालक मैं
पर जिसने मुझको पाला है
उसने मेहनत की रोटी का ही
मुझको दिया निवाला है

मैं हूँ जरूर जग में अनाथ 
पर मेहनत करना जानूँ मैं
भूखा प्यासा सो जाऊँ मैं
पर स्वाभिमान को मानू मैं

**जिज्ञासा सिंह**

भारत भूमि को मेरा नमन (स्वामी विवेकानंद जी को समर्पित)


एक नमन हमारा ले लो ही भारत भूमि पियारी 

मस्तक तेरे तिलक लगाएँ चंदा तारे सूरज 
निशदिन जल से चरण पखारें गंगा जमुना सतलुज 
अंतरिक्ष तक चमके उज्ज्वल छवी तुम्हारी 

ऋषियों मुनियो ने जब खोली घनी जटाएँ 
जा अम्बर पे लिख दीं सुंदर वेद ऋचाएँ 
अंतर्मन के चक्षु खुले और खिली ज्ञान की क्यारी 

आर्यभट्ट का शून्य, व्यास का गीता ज्ञान निराला 
वाल्मीकि की रामायण मीरा का गीत गोपाला 
सूर और तुलसी की गाथा पढ़ती दुनिया सारी 

मन में बसी अयोध्या औ मथुरा में प्राण हमारे ।
काशी मुक्ति मार्ग दिखलाती,मन में चारो धाम बसा रे  
मातु पिता के चरणों की रज हमको जान से प्यारी 

संविधान का मूलमंत्र ही है अभिमान हमारा    
संस्कृति और सभ्यता का गुण देखा विश्व ने प्यारा 
जब नरेंद्र की भरी सभा में गूंजी घंटों तारी 

**जिज्ञासा सिंह**   

जंगल में सावन ( बाल कविता )


इकतारे पे गाय रही कोयलिया
झूमती मोरनी, तोता, तीतर, गौरैया

दृश्य है,सुंदर मधुर सुहावन
झूमता संग संग सारा मधुबन
आ गई मैना होठों पे रक्खे बाँसुरिया

मेंढकों ने तबले पे छेड़ी है जो सरगम
नगाड़े झूम बजाएं भालूराजा डमडम
नाचती घूम रही हिरनी बांधे पैजनियां

बिलों से झाँक रहे हैं गोजर, बिच्छू, चींटी
बदलता रंग, बजावे नन्हा गिरगिट सींटी
नाग ने काढ़ा फन औ झूम उठी नागिनिया

आ गए जंगल के राजा बैठे सिंहासन 
सामने हाथी घोड़ा जमा के बैठे अपना आसन
सियारों और गंधों के बीच दिखावे करतब है बाँदरिया  

जाके बगुलों और बतखों ने बिगुल बजाया
मची है जंगल में दुंदुभी,झूम कर सावन आया
भीगकर मगन हो रहे, झीलों में कछुआ माछरिया

**जिज्ञासा सिंह**

नदी सहारा ढूँढ रही (बाढ़ )


नदी सहारा ढूँढ रही 

भर भर भर भर कटे कटान
गिरे जा रहे बने मकान
नागिन जैसी फन फैलाए
अपना चौबारा सूंघ रही

बूढ़े बाढ़े कई दरख़्त
नदी मुहाना रखते सख्त
काट काट कर दिए गिरा
अब जड़ पकड़े वह झूम रही

वृक्षों पर रहते थे पक्षी
मनुज बन गया उनका भक्षी
विहगों की यादों में डूबी
सरिता दर दर घूम रही

नदी की धारा बन विपदा 
कुछ छोड़ेगी भी नहीं पता
गली गली कूचा कूचा अब 
देहरी अँगना चूम रही 

वो नदी है उसको बहना है
वो इस धरती की गहना है
जो उसका चमन उजाड़े हैं
ले करवट उनको ढूँढ रही 

**जिज्ञासा सिंह**

झरनों का संगीत


झरनों का संगीत सुना तो होगा
मद्धिम गाते गीत सुना तो होगा
कल कल छन छन उज्ज्वल सी बहती धारा का 
आते जाते प्रीत सुना तो होगा

कितने प्रस्तर कितने कंटक राह में आए
सबके सम्मुख अपना मस्तक सदा उठाए
बूंद बूंद से सागर की लहरों की मानिंद
हार में भी एक जीत सुना तो होगा

झरना झर झर अपना सब कुछ देता झाड़
कितना हो दुर्गम, कितना हो खड़ा पहाड़
चलकर रुकना, बीच में थकना न जाने वो
सदा विजय की नीत सुना तो होगा

राह में मिलती गंध छोड़ता जाता वो
नभ की मधुर सुगंध धरा पर लाता वो
नैनो में बस जाता, हिय की प्यास बुझाता
हर मन का मनमीत सुना तो होगा

**जिज्ञासा सिंह**

बहरूपिए भिखारी


बने भिखारी खड़े हुए

गंदली दाढ़ी,फटी जुराबें
फटेहाल दिखते भी मुझको
बास तुम्हारे मुँह की कहती
रोटी नहीं मिली कल तुमको
  
लिए कटोरा घूम रहे
अब मेरे द्वारे गड़े हुए

कभी शहर के इस कोने पे
कभी दिखे उस कोने पर
कितने चक्कर रोज़ मारते
खाने के एक दोने पर

लगता है बस भीख मांगते
छोटे से तुम बड़े हुए

अरे मनुज हो कभी तो सोचो
क्यों कर इस जग में आए हो
देह तुम्हारी हृष्ट पुष्ट है
मन से केवल भरमाए हो

कहूँ अगर कुछ कर्म करो
तो सीना ताने अड़े हुए

ऐसी क्या मजबूरी है जो
कर्म न करना चाहो तुम
भीख मांगकर पेट पालने
का पेशा अपनाओ तुम

तरह तरह का रूप धरे
तुम सबके पीछे पड़े हुए

**जिज्ञासा सिंह**
चित्र-गूगल से साभार 

बचपन के दोस्त


 चलो दोस्त फिर से मुस्कुरा लें । 
ज़्यादा नहीं बस थोड़ा सा,
अपने लिए वक़्त निकालें ।।

याद करें वो घड़ियाँ,

जब खेलते थे हम ताई की बनाई गुड़ियाँ,

मन की ढेरों यादों से,

अपनी कुछ नन्ही सी यादें चुरा लें ।

चलो...


याद करें वो स्कूल के दिन,

खो खो खेलते,कंचे रखते गिन गिन,

झिलमिलाते कंचों सी,

अपनी यादें रंगीं बना लें

चलो...


याद तो होगा ही झूलों पे लम्बी पेंगें लगाना,

हरे लाल गुलाबी दुपट्टों का लहराना,

पत्तियों की सही कीप से ही,

मनमोहक मेहंदी रचा लें ।

चलो...


याद है मुझे मेरी हर ख़ुशी में तुम्हारा ख़ुश होना,

मेरे छोटे से ग़म में मुझसे पहले रोना,

यादों के मोतियों को पिरो,

माला बना सीने से लगा लें ।

चलो...


दोस्त तो दोस्त होते हैं हमेशा,

कोई रिश्ता नहीं होता उनसा,

साल भर सही बस एक दो पल ही,

एक दूसरे को आँखों में बसा लें ।

चलो...


       **जिज्ञासा सिंह**

बिन बुलाए मेहमान (किन्नर समाज को समर्पित)

हमारे देश की पहली किन्नर जज जोयिता मंडल जी बनीं थीं, जो बहुत ही हर्ष का विषय है ......
 मैंने ये कविता उनके सम्मान में तथा अपने एक अनुभव के आधार पर लिखी, क्योंकि मैं भी लोगों की तरह बचपन से किन्नरों को एक अजूबे से ज्यादा कुछ नहीं समझती थी, परंतु मेरे गृह प्रवेश पर जो किन्नर समूह इनाम मांगने आया उसकी मुखिया से जब मेरी काफी देर तक बात हुई तो मुझे लगा कि शायद ये मेरी मां भी है,और बहन या भाई भी, जो अपना जीवन और जीवन का दर्द बयां कर रहा है,उसी रिश्ते को समर्पित मेरी ये कविता....

बिन बुलाए 
वो आए
बन के मेहमान 
फिर सम्मान 
क्या मिलता उन्हें
जिन्हें
अजूबा समझ
बड़े ही सहज
ढंग से
इधर उधर बेढंग से
छोड़ दिया
मुख मोड़ लिया
अपने ही मां बाप 
ने,फिर कितने ही संताप
उन्हें घेरते
छेड़ते
वे लोग भी, जो कि ख़ुद में अधूरे हैं
कितने ही सरसब्ज हो जाएँ पर वे भी कहाँ पूरे हैं
ये किसी ने नहीं सोचा
बस उन्हें नोचा, बार बार नोचा
प्रताड़नाएँ 
ताड़नायें
ऐसी ऐसी
जैसी
कि वो इस संसार के नहीं हैं मनुष्य
फिर उनका भविष्य 
क्या होता जिनके अपने
पड़ोसी,मित्र भाई बहनें
मुंह फेर
ऐसे अलग हुए जैसे बदबूदार कूड़े के ढेर
के किनारे से
किस सहारे से
वे जिएं इस दोमुहें 
समाज को क्या कहें
जो सृष्टि के विधान पर
एक ऐसे इंसान पर 
उंगली उठाता है
जो स्वयं में खुद को नहीं समझ पाता है
कह उठता है, हे परमपिता
इस संसार के रचयिता
तूने मेरे साथ ये क्या किया
ऐसा जीवन क्यूँ दिया
क्या मैं ऐसे ही जीवन का अधिकारी हूँ 
मैं तो प्रकांड ब्रह्मचारी हूँ 
फिर मेरे साथ ये कैसा अन्याय
तेरा अभिप्राय 
समझते सदियाँ बीत रही हैं
और मेरी अपनी इन्द्रियाँ मुझसे प्रश्न कर, खीझ रही है
जिनकी दुश्वरियाँ मेरे सिवा कौन समझे
मैं अपने टूटे, अनसुलझे
इन हौसलों का क्या करूँ 
अब कौन सा रूप धरूँ 
आख़िर उन्हें कैसे समझाऊँ 
कैसे अहसास दिलाऊँ 
कि उन जैसे ही मनुष्य हैं हम
थोड़ा समझो हमारा गम
हमारे मन में उतरकर 
एक कोने में ठहरकर
जरा सोचो एकबार
मेरा आकार
मेरा प्रतिबिंब,मेरी छाया
मुझ में समाया
मेरा दर्द,
तुम्हें मेरा हमदर्द
बना देगा
जिस दिन वो समझ लेगा
कि मैं भी तुम्हारी मां की सन्तान हूँ 
तुम जैसा इंसान हूँ 
बस्स मेरे साथ नियति का खेल चल रहा है,
पर मेरे अंदर वो मानव पल रहा है
जो तुम्हारे आँगन की खुशियों पे झूमता है
तुम्हारे वंश को चूमता है
गले लगाता है
आसमान की ऊँचाइयों तक उठाता है
देता है स्वर्ग तक पहुंचने का आशीष
ऐसा शीर्ष 
जो शायद तुम सोच नही पाओगे
तुम खुद की औलाद को भी नही दे पाओगे
क्योंकि तुम्हें नहीं है उसका मोल
तुम्हारा जीवन है अनमोल
हमारे लिए हमारे समाज के लिए
हमारे आज के लिए
तुम अन्नदाता हो
हमारे विधाता हो 
तुम्हारे आगे हम हाथ फैलाते हैं
तुम्हारे दरवाजे बंद कर लिए जाते हैं
भगाते हो, देते हो हमें दुत्कार
पर वो तो हमें सत्कार 
नज़र आता है 
अधिकार नज़र आता है
तुम पे मेरा
मुझ पे तेरा
क्योंकि हमारा तुमसे जन्मों जन्मों का संबंध है
यही तो वो अनुबंध है
जो विधाता ने किया 
मुझे ऐसा वरदान दिया 
कि मैं नाचूँ गाऊँ तालियाँ बजाऊँ 
खुद पे इतराऊँ, इठलाऊं
बन ठन कर 
सज सँवर कर, 
झूम झूम कर कहूँ, कि मैं न नारी हूँ न नर हूँ 
तुम्हारे लिए अपूर्ण हूँ, अपने लिए सम्पूर्ण, एक किन्नर हूँ  

**जिज्ञासा सिंह** 

सैनिक का संकल्प


मातृभूमि का एक इंच, टुकड़ा लेकर दिखलाओ
गर हिम्मत है मेरे सम्मुख, सीना तान के आओ

यही प्रतिज्ञा लिए हुए हम, निकले अपने घर से 
दुश्मन पीठ दिखाकर भागा,योद्धाओं के डर से
बाँधे कफ़न घूमते हैं हम, हम से आँख मिलाओ    
ग़र हिम्मत है..

अपनी सीमा की रक्षा है, हमको जान से प्यारी 
सिंचित कर दें खून से धरती, उठे जो नज़र तुम्हारी 
धूर्त पड़ोसी सीमा में रह, इधर न नज़र उठाओ 
ग़र हिम्मत है..

गर आक्रांता कोई, सीमा के अंदर आएगा
मिल जाएगा खाक में वो, फिर लौट नहीं पाएगा
ऐसे दुश्मन को मारो, धरती की प्यास बुझाओ
ग़र हिम्मत है..

गौरवशाली राष्ट्र हमारा,गौरवशाली सेना 
आन बान औ शान की ख़ातिर, आता जीवन देना  
एक मंत्र है देश के लिए, मिट्टी में मिल जाओ 
ग़र हिम्मत है.. 

भाषा,नस्ल,धर्म,जाति पर, देश में जो हैं लड़ते  
वही राष्ट्र की संप्रभुता को, खण्डित हर क्षण करते 
बाहर अंदर के बैरी तुम, सजग जरा हो जाओ
ग़र हिम्मत है..

**जिज्ञासा सिंह**