राम वन गमन

नृप घर जन्म लियो बैदेही ।
मिले राम प्रिय प्रेम सनेही ।।
काल कुचाल चला जब अपने ।
उजड़ा अवध टूट गए सपने ।।
कुबड़ी ने एक जाल बिछाया ।
कैकेई को खूब फंसाया ।।
मति मतांध में मातु फँसी जब ।
रघुवर को बन भेज हँसी तब ।।

ऐसी बिपदा आ पड़ी, अवधपुरी पर आज ।
दसरथ नैनन नीर हैं, रोवत सबहि समाज ।।

दोनों भाई राम लक्ष्मन ।
बैदेही संग जाते हैं बन ।।
पूरा अवध आज ब्याकुल है ।
पसु पच्छी स्रिस्टी आकुल है ।।
कौन धराए धीर अवध को ।
भूमि परे राजन दसरथ को ।।
मान किया रघुवर ने नृप का ।
धर्म निभाया राजन सुत का ।।

दिन बीते बीती निसा, उठि रघुनंदन भोर ।
पीत वस्त्र धारन किया, चले हैं बन की ओर।।

**जिज्ञासा सिंह**

प्रगति और प्रकृति का संघर्ष

मनुजता और प्रकृति के मध्य एक संघर्ष जारी है

मनुज सौ दिन प्रकृति को छल के, चढ़ता शीश पर उसके,
प्रकृति ने चाल उसकी, एक क्षण में यूँ उतारी है ।

कि पर्वत ऋणखलाएँ टूट कर, गिरती हैं तृण बनके 
औ चट्टानों में दबकर सिसकतीं साँसें हमारी हैं ।।

घने वन के दरख़्तों ने हमें क्या कुछ है कम झेला ?
वो रोते रह गए, हमने चलायी उनपे आरी है ।

मनुज ही ऐसा प्राणी है, जो साँसों का करे सौदा,
तो मानव ही जगत में, श्वाँस का दिखता भिखारी है ।।

अनर्गल क्षत विक्षत करते धरा जो, स्वार्थ वश अपने,
उन्हीं के वंश पर चलती, प्रकृति की भी कुल्हारी है ।

चमन में डाल पर बैठा उजाड़े घोसला जो खुद,
धरा भी फिर कहाँ उनके लिए आँचल पसारी है ।।

चलो माना प्रगति की राह में आती हैं ये मुश्किल,
मगर जो ठान ले कोई तो बाधा उससे हारी है ।

बड़ी विपदा भी टल जाती, प्रकृति का नियम मानें गर,
मगर मानव कहां माने, वो लिप्सा का पुजारी है ।।

**जिज्ञासा सिंह** 

ध्यान धरो

हे मन मेरे ध्यान धरो

विचरण मन जब करे सघन वन
पात खोजता है वो निर्मल 
क्षीण दिख रही है बगिया की
नई अंकुरित कोमल कोपल

फिर भी कलिका खिली हुई जो
उसका ही कुछ मान करो

एक दिशा और एक दशा में
चलते जाते कई अनावृत्त
रेखाओं का जाल सजाया
मूक हो गई पर आकृत

कितनी बार कहा है चुप हो
रेखाओं में रंग भरो

साध्य और साधन का लेखा
भूल भी जाओ आज जरा रे
विजय वहाँ की नियति में होगी
सौ सौ बार जहाँ हारे

ऐसी निजताओं के भूखे
बनो और सम्मान करो

वही जोगिनी यात्रा होगी
जिस पर चलते लाखों पग
अधम अगम सब योग्य दिखेगा
तृष्णा बन जब उड़े विहग

अरे उठो तुम तनिक जमी से
खुद को थोड़ा दान करो

अनदेखी अनचाही यात्रा
लगती बड़ी कठिन दुर्गम 
विचलन मन का हो या तन का
मैं हूँ, मैं ही हूँ बस मम ।।

है मंतव्य घिरा मानुष मन
दूर जरा अभिमान करो

**जिज्ञासा सिंह**
चित्र साभार गूगल 

पिरामिड: मर्यादा पुरषोत्तम श्रीराम

श्री
राम
अराध्य
मरयादा
पुरषोत्तम
रघु कुल मणि
अवध शिरोमणि ।।

हे
राम
विनती
करें प्राणी
करो उद्धार
कलयुग आया
मानव भरमाया ।।

माँ 
मान
सम्मान
निष्कासन
वन गमन
हँसते हँसते
राम लक्ष्मण सीते ।।

वो
राम
रावण
विभीषण
सीता हरण 
घनघोर रण
जीत ध्वजारोहण ।।

हैं
नर
महान
रघुवर
नारायण भी
बसाते हृदय,
सृष्टि के प्राणी सभी ।।

**जिज्ञासा सिंह**

शिकन बादलों की


शिकन सी बादलों पे आज बड़ी छाई है ।
कहे वो जा रहे देखो बहार आई है ।।

धुआँ-धुआँ सा आसमान हुआ जाता है ।
हवा भी चलते हुए राह डगमगाई है ।।

जमी पे जल रही ज्वाला ने रूप बदला है ।
फिजा की खो गई रंगीन तरूणाई है ।।

खगों ने गुलशनों में आना छोड़ दिया है बिलकुल ।
चमकते परों में कुछ जंग सी लग आई है ।।

दिए की रोशनी से कैसे अब उजाला हो ।
निकलते सूर्य की आंखें भी डबडबाई है ।।

जो कह रहे हैं चमन ये बड़ा ही सुंदर है ।
उन्हीं के द्वार पर बजती सदा शहनाई है ।।

यहाँ तो हो रहा है, चलती साँसों का सौदा ।
बड़ी मुश्किल से डोर श्वाँस की बचाई है ।।

**जिज्ञासा सिंह**

और कौन प्रभु खेवनहार ?

और कौन प्रभु खेवनहार ?

धरती से ऊपर पग हैं,
औ धरती खींच रही मुझको ।
हाथ अंजूरी कढ़ी हुई,
मैं पग पग ढूँढ रही तुझको ।।

मेरे मन की शंकाओं की,
सुन लो अब तो करुण पुकार ।

डाल डाल पर बैठ चुकी मैं ।
हर डाली है टूटी खंडित, ।।
मगर सुनहरे धागों से खुद,
को करती महिमामंडित ।।

मैं भूखी प्यासी तंद्रा में,
भागी फिरती हार कछार ।

वह बीती बातों की चर्या ।
तुम्हें सुनाकर पाऊँ क्या ?
जिनके टूटे तारों से मैं,
मधुर गीत फिर गाऊँ क्या ?

वीणा की धुन अन्तर्मन से,
प्रतिपल मुझसे करे गुहार ।

छाई काली घटा काट के ।
रश्मिप्रभा आई सज के ।।
मस्तक झुका हुआ रमता है,
चरणों की कोमल रज के ।।

करूँ आचमन गंगाजल से,
पहनाती पुष्पों का हार ।
और कौन प्रभु खेवनहार ?

**जिज्ञासा सिंह**

अमृत है हर बूँद


बूँद एक टपकी गगन से ।
बूँद एक टपकी नयन से ।।
बूँद का हर रूप मानव, 
को परिष्कृत कर गया।।

बूँद गिरती जब सुमन पे ।
बूँद गिरती जब तपन पे ।।
बूँद का प्रारूप प्रकृति को,
सुसज्जित कर गया ।।

बूँद की भर के अँजूरी ।
बूँद हर पल है जरूरी ।।
बूँद का प्यासा समंदर,
खुद को गहरा कर गया ।।

बूँद है आकार जीवन ।
बूँद से साकार तन मन ।।
बूँद ही बनकर रुधिर हर,
धमनियों में बह गया ।।

बूँद की महिमा जो समझे ।
बूँद को प्रतिपल सहेजें ।।
बूँद को अमृत समझने,
वाला सागर बन गया ।

**जिज्ञासा सिंह**

बंधनों में मासूम


बंधनों में बंध गईं वो उँगलियाँ
जो पकड़ने की उमर थीं तितलियाँ

जानती हूँ तुम गरीबी से घिरी हो
और समझती मैं तेरी मजबूरियाँ

इस परिश्रम से मिलेंगे चार पैसे
और पैसे से मिलेंगी रोटियां

काश उन हाथों को देती पुस्तकें मैं
पढ़के, चढ़ती तुम शिखर की चोटियाँ 

तेरे द्वारे भी दिवाली हँस के आती 
तुम सजातीं थाल औ दीपों की लड़ियाँ  

एक चमन होता तेरा फूलों का प्यारा
होंठ पे खिलती सदा फूलों की कलियाँ 

खेलती तुम चाँद तारों बीच बैठी
साथ होती सुनहरे पंखों की परियाँ 

पर तुम्हारी उँगलियों को क्या कहूँ मैं
उनके हाथों सज रहीं चिंगारियाँ

जो खुशी देती हैं लोगों को जहाँ में
पर तुम्हें देती हैं केवल रोटियाँ 

**जिज्ञासा सिंह**
      लखनऊ

राम जी पधारेंगे


आजु द्वार ठाढ़े सभी, 
दीपों का थाल लिए,
मेरे प्रभु रामजी,
वन से पधारेंगे ।

अँचरा के कोर से,
अँगना बुहार रही,
भरके परात जल,
चरण पखारेंगे ।

लड़ियाँ लगाय,  
दूँगी कलश भराय,
सखी दियना जलाय,
पूरे अवध को साजेंगे ।

चंदन चौकिया पे,
फुलवा बिछाय दूँगी,
राम लछिमन और,
जानकी विराजेंगे ।

**जिज्ञासा सिंह**

एक दीप जल रहा

रात्रि श्यामला सनी,
              कालरात्रि सी घनी ।     
                                आज तिमिर से ठनी ।।        
एक दीप जल रहा,
                वायु संग मचल रहा ।
                               बर्फ सा पिघल रहा ।।
बुझ गया अगर कहीं,
               दिख रहा है डर यही ।
                               मिल रही डगर नहीं ।।
बस वही बचा था जो,
                   कब से जल रहा था वो ।
                                यूँ संभल रहा था वो ।।
जैसे काल आ रहा,
             दीप को बुझा रहा ।
                             अंधकार ला रहा ।।
हो गए दिशा भ्रमित, 
             थे कहाँ हुए रमित ।
                          भूलकर वही गणित ।।
कि है बड़ी विशाल भव,
                बन के दीप जोति लौ ।
                            ज्ञान का करे प्रसव ।।
आदि अंत है वही,
                  उसने कुछ समझ कही ।
                            उसके कोख में बही ।।
जिसपे सबका वास है,
                प्रभु का निज निवास है ।
                              तू उसी का दास है ।।
ऊष्मा को ले के संग, 
               औ प्रकृति के सात रंग ।
                              सच कहूँ यही उमंग ।।
वक्त की पुकार भी,
             कंठ का है हार भी ।
                            सृष्टि का श्रृंगार भी ।।
इस धरा को पूज तू,
            ढूंढ अब न दूज तू ।
                            न भटक न बूझ तू ।।
कह रही हूँ ऐ मनुज,
              बन धरा का तू अनुज ।
                        जो दिया रहा है बुझ ।।
उस दिए को तू जला,
              तू बना ये सिलसिला ।
                          फूल एक रहे खिला ।।
कहीं न हो कोई दमन ।
                खिला खिला रहे चमन ।।
                             दीप लौ उड़े गगन ।।
                   
         **जिज्ञासा सिंह**