नृप घर जन्म लियो बैदेही ।
मिले राम प्रिय प्रेम सनेही ।।
काल कुचाल चला जब अपने ।
उजड़ा अवध टूट गए सपने ।।
कुबड़ी ने एक जाल बिछाया ।
कैकेई को खूब फंसाया ।।
मति मतांध में मातु फँसी जब ।
रघुवर को बन भेज हँसी तब ।।
ऐसी बिपदा आ पड़ी, अवधपुरी पर आज ।
दसरथ नैनन नीर हैं, रोवत सबहि समाज ।।
दोनों भाई राम लक्ष्मन ।
बैदेही संग जाते हैं बन ।।
पूरा अवध आज ब्याकुल है ।
पसु पच्छी स्रिस्टी आकुल है ।।
कौन धराए धीर अवध को ।
भूमि परे राजन दसरथ को ।।
मान किया रघुवर ने नृप का ।
धर्म निभाया राजन सुत का ।।
दिन बीते बीती निसा, उठि रघुनंदन भोर ।
पीत वस्त्र धारन किया, चले हैं बन की ओर।।
**जिज्ञासा सिंह**
