कुछ तो अच्छा होगा ही
नज़र बदल कर देखा
क़दम क़दम पर खड़ी मुसीबत
सुबह शाम होती है हुज्जत
मिलती नहीं किए की क़ीमत
डगर बदल कर देखा
कुछ....
लगा रहा लोगों का मेला
खेल सभी ने मुझसे खेला
बहुत तमाशा हमने झेला
नगर बदल कर देखा
कुछ....
आई आशा भेष बदलकर
अभिलाषा की चुनर ओढ़कर
खड़ी हो गई राह रोक कर
बाँह पकड़ कर देखा
कुछ....
वह बोली जीवन है कहता
दुख सुख आता जाता रहता
सब कुछ बुरा नहीं हो सकता
सोच बदल कर देखा
कुछ....
खुली आँख से जो कुछ देखा
वही बना ली जीवनरेखा
बाक़ी सब कर के अनदेखा
आगे बढ़ कर देखा
कुछ....
**जिज्ञासा**






