ऐसे गुरु को हम जीवन का, बस एक दिवस अर्पण करते
जो जीवन भर की पूँजी को, हम पे ही निछावर करते हैं
ये तारे हैं,ये अम्बर है,ये गहरा बड़ा समंदर है
इस धरती के हर उद्यम को, वो हमसे जोड़ा करते हैं
मेरे हिरदय से दम्भ द्वेष, छल छिद्र को दूर भगाने को
हर ऊंच नीच और बाधा की, दीवारें तोड़ा करते हैं
मैं सात रंग के इंद्रधनुष पर, अहम का तीर चढ़ाऊँ ज्यों
वो हाथ जोड़ प्रकृति के द्वारे, विनय निवेदन करते हैं
वह दया,धर्म औ करुणा से, पहला परिचय करवाने को
निर्जीवों और परजीवों से, नित मुझे मिलाया करते हैं
मैं जब भी अम्बर के तारों को, धरती पर लाना चाहूँ
वो सहस मेरे भावी मन की, पल पल अगवानी करते हैं
वह कहते तुम हो श्रेष्ठ सदा, इतनी विशाल इस दुनिया में
मेरे अविचल मन के भीतर, वह धीरज भरते रहते हैं
वह गुरु भी हैं अभिभावक भी,वह बंधु सखा भी बन जाते
हम गर्वित हो अपना मस्तक, इस जग में ऊँचा करते हैं
मैं अंधियारे में घिरूँ कभी, मंतव्य वही मन में आते
विश्वास और आशा की जो, वो ज्योति प्रवाहित करते हैं
उस ज्योति की लौ की छाया से, उत्सर्ग करूँ अपना ललाम
मैं निशदिन तुम्हें समर्पित हूँ, हे गुरुवर तुमको है,प्रणाम !!
**जिज्ञासा सिंह**


